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Friday, July 19, 2013

मन की सुन

गम को लेकर दुनिया भर का,
खुद को क्यों ग़मगीन करूँ,
क्यों इंतज़ार दिन ढलने का,
मैं आँखें क्यों ना बंद करूं।
क्यों चौबेजी मैं बन बैठूँ,
जब छब्बे बनकर मस्त रहूं,
माथे पर क्यों पड़ने दूं बल,
जब खाऊं पियूं बलवान रहूँ।
सोच सोच के क्यों हारूं,
जब हरा हरा के सुचवाऊँ,
इज्जत पे मेरी बन आये,
इतना भी इज्जतदार नहीं।
आसां नहीं, इतना जीवन,
सुनते-सुनते जीवन बीता,
एक कसक रह गयी जीवन में,
क्यों बहिर ही मैं पैदा न हुआ?
हर पल रहना बोझ तले,
क्यों चाहूं मुझको ईश मिले,
बोझ तो गधा उठाता है,
औ पीता तो चीता भी है।
जटिल नहीं होता है कुछ,
जटिलता बस अनुभूति मात्र,
कैलाश ही सबको चढ़ना है,
कभी कुआं खोद के पानी पी।
जब लगे कि है शामत आयी,
क्षितिज ताक, जरा मुस्करा,
गुनगुना उठ मस्ती की धुन,