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Monday, July 25, 2011

आँखों में हैं ऐसी तन्हाइयां

मेरी आँखों में हैं ऐसी तन्हाइयां,
कि नींदों में आती बस अंगड़ाइयां|
लगे है बेगाना कुछ ऐसा जहां,
जैसे ओझिल है रातों को परछाइयां|
पास होकर भी वो दूर जाती रही,
मार ठोकर हमें, मुस्कराती रही|
उसकी लानत में है एक ऐसा मज़ा,
बिना उसके ताने, यह जीवन सजा|
उन बातों की यादें, हैं आती मुझे,
कि रातों कि आहट में खोजूं तुझे|
तेरी मुस्कराहट, एक ऐसा नशा,
उन मदहोशियों में, यह बेबस फसा|
जंगल का राजा, होने दो शेर को,
एक दिन तो खदेड़ा वो भी जाएगा|
अगर पास हो शेरनी,  तेरे जैसी तो,
खदेड़ने पर भी राजा वो कहलायेगा|
ऐ काश, रेत रूकती मेरे हाथ में,
समय को भी थमने को कह पाता मैं|
तो साहिल से कराता में पहचां तेरी,
और चुपके से तुझको सता जाता मैं|
होश वालों को होती नहीं जो खबर,
वो खबर मैं नशे में सुनाता रहा|
रात भर मेघ काले, बरसते रहे,
रात भर गीत, मैं गुनगुनाता रहा|
मेरी आँखों में हैं ऐसी तन्हाइयां,
कि नींदों में आती बस अंगड़ाइयां|
लगे है बेगाना कुछ ऐसा जहां,
जैसे ओझिल है रातों को परछाइयां||

Thursday, June 16, 2011

अंगुलियाँ तेरी

गुनगुनाती हैं नए तराने,
अहसासों का सैलाब लिए,
कुछ न कहकर सब कह जाती,
तेरी यह जालिम अंगुलियाँ|
 
कमल की कोमल पंखुड़ियां,
छू देती हैं, सिरहन करके,
होने की मेरे करती पुष्टी,
तेरी यह मादक अंगुलियाँ|
 
हाथों में लेकर पुच्के/गुजिया,
ओठों तक तेरे जो पहुंचाती,
कभी आह भरी, कभी चाह भरी,
तेरी यह पूरक अंगुलियाँ|
 
शोभा हीरे की तुझसे है,
जो अंगूठी बनके बैठा है,
हीरे की चमक को चमकाती,
तेरी यह यौवन अंगुलियाँ|
 
जाते में मुझको पकड़ा था,
बाहों में भींच के जकड़ा था,
बालों, कपडों को खींच रही,
तेरी यह गुमसुम अंगुलियाँ|
 
दिन था बुरा, परेशां था में,
सर पर मेरे वो शीतल स्पर्श,
हाथ लगाकर दर्द किया फुर्र,
थकान मिटाती यह अंगुलियाँ|
 
लाल की लाली में डूबीं कभी,
कभी हरियाई हरे की छाई है,
नाखूनों पर छितरे सतरंग से,
इन्द्रधनुष सी तेरी यह अंगुलियाँ|
 
वो बारिश में तले पकोड़े थे,
गरम गरम औ सुरख सुरख,
उनपर एक छाप सी छोड़ गयीं,
तेरी यह पाँचों अंगुलियाँ|
 
साथ साथ थे पकडे हाथ,
तुझे अपना बनाया मैंने था,
पहना के अंगूठी प्रेम की,
मेरी हो गयीं, तेरी अंगुलियाँ||

Saturday, August 28, 2010

नींद शर्मा गयी


आखें उसके दीदार के नशे में डूबीं थी ऐसे,
की नींद भी शर्मा के रह गयी रात भर,
लफ्ज़ मिले नहीं बहुत सोच कर,
जब मिले तो जबाँ दगा दे गयी,
हाथ घायल थे उसके भर स्पर्श से,
कलम उठाई तो सियाही सूखी निकली,
बहुत हिम्मत कर उस दिन स्टेशन पहुंचे हम,
जालिम ट्रेन को भी उसी दिन समय पर आना था,
निगाहों ने बस उसको ढूँढा सारी तरफ,
जब दिखी तभी बारिश आ गयी,
मिलना था उससे जब, ख्वाबों में,
कातिल एक बार फिर नींद दगा दे गयी|

Monday, July 5, 2010

अनजान हँसी

पिछली सर्दी की बात है ये
घर पर था छुट्टी मना रहा
धुंध की चादर ओड़े था
सूरज भी ठुर ठुर ठिठुर रहा |

सुबह सुबह सी दोपहर थी जो
तफरी करने को निकला मैं
सायें सायें कर हवा कटी
सुड सुड करती सी नाक बही |

साथ मैं मेरे जॉय थी था
गुस्से से मुझको घूर रहा
खुद को तो चले मारने तुम
मेरे को काहे खत्म करो |

तभी दिखी कुछ दूर तलक
एक जानी पहचानी अनजान झलक
वो खिल खिल करती एक मस्त हँसी
जॉय की भी पूँछ हिली |

छम छम करती वो हुस्न परी
गरमाती मौसम तरी तरी
जी भरकर देख ना पाया मैं
कुछ और धुंध सी बही तभी |

वो चेहरा ढूँढ रहा तबसे
एक झलक मांग रहा रबसे
पर मिल ना पाया मुझे कभी
भूलने की कोशिश करुँ अभी |

वो थी एक अनजान हसीं
मेरी धड़कन उसमें है फसीं
पिछली सर्दी की जो है बात
इस सर्दी मैं काश हो मुलाक़ात |