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Thursday, June 16, 2011

अंगुलियाँ तेरी

गुनगुनाती हैं नए तराने,
अहसासों का सैलाब लिए,
कुछ न कहकर सब कह जाती,
तेरी यह जालिम अंगुलियाँ|
 
कमल की कोमल पंखुड़ियां,
छू देती हैं, सिरहन करके,
होने की मेरे करती पुष्टी,
तेरी यह मादक अंगुलियाँ|
 
हाथों में लेकर पुच्के/गुजिया,
ओठों तक तेरे जो पहुंचाती,
कभी आह भरी, कभी चाह भरी,
तेरी यह पूरक अंगुलियाँ|
 
शोभा हीरे की तुझसे है,
जो अंगूठी बनके बैठा है,
हीरे की चमक को चमकाती,
तेरी यह यौवन अंगुलियाँ|
 
जाते में मुझको पकड़ा था,
बाहों में भींच के जकड़ा था,
बालों, कपडों को खींच रही,
तेरी यह गुमसुम अंगुलियाँ|
 
दिन था बुरा, परेशां था में,
सर पर मेरे वो शीतल स्पर्श,
हाथ लगाकर दर्द किया फुर्र,
थकान मिटाती यह अंगुलियाँ|
 
लाल की लाली में डूबीं कभी,
कभी हरियाई हरे की छाई है,
नाखूनों पर छितरे सतरंग से,
इन्द्रधनुष सी तेरी यह अंगुलियाँ|
 
वो बारिश में तले पकोड़े थे,
गरम गरम औ सुरख सुरख,
उनपर एक छाप सी छोड़ गयीं,
तेरी यह पाँचों अंगुलियाँ|
 
साथ साथ थे पकडे हाथ,
तुझे अपना बनाया मैंने था,
पहना के अंगूठी प्रेम की,
मेरी हो गयीं, तेरी अंगुलियाँ||