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Tuesday, January 17, 2012

जबसे गयी हो दूर

जबसे गयी हो तुम दूर, एक दर्द सा होता है,
होता है क्यों दर्द ये, है मुझे मालूम नहीं,
मालूम मुझे बस इतना है, कि नींद मुझे न आती है,
नींद कभी जो आ जाए, सपनों में याद सताती है||

दिन कटते हैं जैसे तैसे, रात काटने को आती,
कैसे काटूं रात ये दिन, मुझे समझ न आता है,
समझदार मैं था तो बहुत, पगला मैं बन बैठा हूँ,
बैठे बैठे, बस सोचूँ ये, किस्मत से मैं क्यों ऐंठा हूँ||

वो रास्ते, वो गलियाँ, जिनपर चलते थे हम तुम,
चलना भी दुष्वार हुआ, छाले क़दमों पे पड़ते हैं,
कदम मुझे ले जाते हैं, तेरे दरवाज़े की ओर,
दरवाज़े बंद पड़ जाते हैं, बिन तेरे किस्मत के||

तू जब थी बेहोश, वो पल लम्बे थे जीवन के,
एक बेचैनी छाई थी, तड़प रहा था मन ही मन,
तुझे कभी जो दर्द हुआ, चुभन मुझे महसूस हुई,
कब जाने ऐसा होने लगा, मुझसे पहले तू आने लगी||

वापस आजा जान तू अब, विरह सहन न होती है,
सहन जाऊंगा दुत्कार तेरी, पास जो तू मेरे होगी,
पास नहीं जो मेरे तू, जीवन जीने की आस नहीं,
इसी आस में बैठा हूँ, की आने वाली तू जल्दी है||