Showing posts with label mankind. Show all posts
Showing posts with label mankind. Show all posts

Tuesday, March 15, 2011

हुआ मनुष्य लाचार क्यों आखिर

डरता हूँ मैं, डरता क्यों हूँ?
हर पल मैं आखिर मरता क्यों हूँ?
ऐसी कौन सी गली मैं मुडा,
राह सभी बे-राह हुई जो|
पीता जब हूँ, रब दिखता है,
परदे के पीछे सब दिखता है,
काल-चक्र का उल्टा चलता,
सभी सफलता, लगी विफलता|
डर-डर के जीवन, जीता हूँ में,
गम का सागर पीता हूँ में,
इस माहौल में और नहीं अब,
“एक दिन आएगा”, आएगा कब?
रो-रो के जीवन, जहन न होती,
दर-दर की ठोकर, सहन न होती,
हूँ मैं बेबस, जज्बात लदे हैं,
कुछ कर जाता, हाथ बंधे हैं|
हुआ ये कैसे, मनुष्य लाचार
मुझे पता ना, पता है तुमको?