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Saturday, March 9, 2013

बे-बस

थका हारा चढ़ा मैं बस में,
बगल में आकर बैठ गयी वो,
नींद उसकी आँखों में झलकी,
मेरा कन्धा कब बना सिरहाना,
न वो समझी, न मैंने जाना,
उसको उठाने को मन न माना,
मेरा स्टॉप जाने कब निकला,
एक मक्खी परेशां करने लगी,
अखबार से पंखा करता रहा,
टिकट आखिर की ले दी उसकी,
टीटी कहीं उठा न दे उसको,
बस की यात्रा में जिंदगी सजा ली,
सोते में उसके चेहरे पर हँसी,
दिल ले गयी हमारा, कन्धा भी,
जैसे जैसे आखिर स्टॉप आने लगा,
हमारे दिल में टीस सी उठने लगी,
सोचा उठाऊँ उसको, पूछूं नाम,
पर कुछ कर न पाया,
आखिर बस रुक गयी,
आवाज लगी, सब उतरो,
वो उठ गयी, कुछ अनजान,
कंधे से उठी, शर्मिंदा सी,
हम कुछ कहने को हुए,
जो ख्वाब बुने थे बयां करूँ,
वो बाल सही करने लगी,
दुपट्टा भी ठीक किया उसने,
गला ठक रहा था अबतक,
तभी कुछ दिखा हमें,
फलक में शब्द रुक गए,
सारे अरमां खाख हुए,
छुपा हुआ था पल्लू में जो,
हमें दिखा उसका मंगलसूत्र।