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Friday, July 15, 2011

जल उठी धरती फिर

जल उठी धरती फिर धू धू करके,
फिर हुआ स्तम्भ विस्तंभ आज,
छाती चौड़ी, अब जीता डरके,
गम में मुस्कराना, गहरा राज|
कुछ घना, कुछ गहरा, एक साया,
चहचहा उठे पंची सारे, सांझ भई,
धड़कन बढ़ी, सकुचा, दिल घबराया,
पुराने सब काल हुए, दुर्घटना नई|

कितने हँसे, कितने रोये, क्या गिनती,
मुखौटे से दिखे सब, मूक मय अवाक,
ग्रसित हैं, मुक्त करो, बस यही विनती,
कुछ न बचा, साथ गयी झूठी साख|

एक बटन दबा, एक घनघोर ध्वनी,
चिथड़े उड़े, हर ओर गिरे, सब शांत,
चीख भी उसकी, न निकली, न सुनी,
रो उठे सागर, हिंद से लेकर प्रशांत|

लाचार लगे अब, कुछ न कर पाऊँ,
शीश महल, अब नहीं बचा, चूर-चूर,
घर कब्जाया, खतरा, अब कहाँ जाऊं,
पास था साहिल, लगे अब दूर-दूर|

शैतान था वो, कुकृत्य किया जिसने,
बेबाक जिंदगी, न कभी जिए डरके,
सरफ़रोश हुआ, तृप्त-अमृत पिया उसने
जल उठी धरती जब धू धू करके|